विकास के मसीहा के संसदीय क्षेत्र में मरने के बाद भी फजीहत।
मौत के बाद भी सम्मान जनक अंतिम संस्कार नसीब नहीं।
चुनावी मंचों के दावे और वादों को भूल गए सिंधिया।
गुना में श्मशान भी नसीब नहीं_ग्रामीण क्षेत्रों में विकास की खुली पोल
गांव में न कोई मुक्तिधाम है, न छांव के लिए कोई टीन शेड। चारों ओर कीचड़, पानी और सन्नाटा
अंतिम संस्कार की कोई व्यवस्था नहीं है — न व्यवस्था है, और न जगह समतल। परिजनो की आंखों से आंसू बह रहे हैं, और ऊपर से बारिश की बूंदें जैसे हर आँसू को और भी भारी कर रही है। एक जीवन की अंतिम विदाई इतनी बेबसी और तिरस्कार से होगी, किसी ने सोचा न था। सरकार के वादे कागज़ों में दफन हैं, लेकिन असली शव गांव की उम्मीदों का था।
विकास पुरुष ज्योतिरादित्य सिंधिया के संसदीय क्षेत्र गुना में लोगों को मरने के बाद भी दाह संस्कार के दाह संस्कार के लिए तरस रहे मृतक। जी हाँ यह हम नहीं कह रहे यह बमोरी के सनवाड़ा ग्राम पंचायत के बनवाड़ा गांव की तस्वीरें बयान कर रही हैं की विकास के मसीहा माने जाने वाले केंद्रीय मंत्री सिंधिया के लोकसभा क्षेत्र में शमशान भी नहीं है। यदि शमशान है तो वहां लोगों के दाह संस्कार के लिए टीन शेड नहीं है लोगों के शव को रखने के लिए चबूतरे नहीं है। है तो केवल अव्यवस्थाएं और दाह संस्कार के लिए जमीन पर बारिश में पैदा हुई घास और झाड़ियां जिन्हें किसी भी शव का अंतिम संस्कार करने से पहले साफ करना पड़ता है। आप सोच सकते हैं कि विकास के बड़े-बड़े दावे करने वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया के गुना के बमौरी विधानसभा में किसी शव यात्रा में शामिल मृतकों के परिजनों को किसी अपने के जाने का दुख सहने के साथ श्मशान में जाकर साफ सफाई भी करनी पड़ती है। जिला प्रशासन और स्थानीय जनप्रतिनिधियों की इससे बड़ी बेशर्मी और क्या हो सकती है कि लोग मरने के बाद भी चैन न मिले।
