वर्चस्व की लड़ाई में पत्रकार संघ में दरार…

ग्वालियर चम्बल अंचल के सबसे बड़े‌‌ पत्रकार संघ में दरार
सालों रहे साथ फिर जरा सी बात पर विघटन‌ की तैयारी

ग्वालियर, देश में पत्रकारों के हित में काम करने वाले हजारों संगठन हैं। और इनमें से हर संगठन पत्रकारों के लिए काम करने का दावा भी करता है। अब ये दावे कितने सच हैं और कितने जमीनी ये तो पत्रकारिता करने वाले कलमकार जानें या इन संगठनों को चलाने वाले कतिपय वरिष्ठ पत्रकार गण। लेकिन इतना तय है कि इन पत्रकार संगठनों में कहीं न कहीं कुछ तो है जो पत्रकारों का मोह संगठनों से खत्म होता जा रहा है। यहाँ अहम बात ये है कि पत्रकारिता के क्षेत्र में बिना सुविधा बिना सुरक्षा और बिना‌ किसी इंश्योरेन्स के काम करने‌ वाले नवोदित पत्रकारों के लिए ये संगठन कितना कर पाते हैं। ये एक बड़ा सवाल है शायद यही वजह है कि पत्रकारिता और लेखन से नई पीढ़ी का मोहभंग हो रहा है। चंद भूले भटके युवा इस क्षेत्र में कुछ करने कुछ सीखने‌ आते भी हैं तो पहले से स्थापित वरिष्ठ लोग उन्हें कुछ सिखाने की बजाय इन नवांकुरों को हतोत्साहित करने के साथ बिना जाने पहचाने नकली होने का तमगा पहना देते हैं। और इसके साथ ही जन्म लेती है एक ऐसी पत्रकारिता जो किसी भी मायने में पत्रकारिता तो नहीं होती। एक वजह ये भी है जो इस क्षेत्र में आने वाले नए नवेले पत्रकार भी इन संगठनों से इत्तफाक नहीं रखते। और इसी कारण से जो पुराने स्थापित पत्रकार भी अब इनसे दामन छुड़ाने में लगे हैं। हालांकि सबके अपने स्वार्थ हैं सबके अपने हित और मजबूरियां लेकिन ये तय है कि जब सबको निशाने पर लेने वाले पत्रकारों की कोई खबर सामने‌ आती है तो सभी लोग चटखारे लेकर पढ़ते जरूर हैं।

कब क्यों और कैसे पड़ी पत्रकारों के सबसे बड़े संगठन में दरार

ग्वालियर चंबल अंचल में ही‌ नहीं अपनी अलग कार्यशैली के लिए सम्पूर्ण प्रदेश में जाना जाने वाला पत्रकार संघ अब टूटने के‌ कगार पर है और ये क्यों हुआ कब हुआ और कैसे हुआ हम इस पर बिल्कुल नहीं जाएँगे। लेकिन हम इतना जरूर बता दें कि इस संगठन में वर्चस्व की लड़ाई की सुगबुगाहट पहले से ही‌ नजर आ‌ रही थी। वैसे तो इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट के बीच कॉम्पटीशन हमेशा से रहा‌ है लेकिन यही कॉम्पटीशन जब संघ में वर्चस्व की लड़ाई में तब्दील हो‌ जाए तो अलगाव‌ होना तय है। कहानियां बहुत सारी हैं लेकिन पुष्टि करने से‌ हर कोई बच रहा है यहाँ हर किसीकी अपनी मजबूरी अपने स्वार्थ होते हैं और हम पत्रकारों की एक खास आदत होती है कि जैसा की हमें सिखाया जाता है कि हम हर बात को ऑब्जर्व करते हैं कभी रिएक्ट नहीं करते यही चीज इस संगठन के खास सदस्यों के बीच रार में सामने आई है। इस्तीफे का एलान बाकायदा ग्रुप में चंद नाम डालकर कर दिया गया है। हालांकि इसकी पुष्टि अब तक नहीं हो पाई है। लेकिन इतना जरूर है कि वर्षों पुराने संगठन की दीवारें हिलने लगी हैं। वहीं अपुष्ट सूत्रों के मुताबिक माना‌ जा रहा है कि भविष्य में किसी नए संगठन का निर्माण संभावित है।
बाकी तो राम ही राखे…

कुछ बड़े चेहरे‌‌ नहीं रहेंगे पत्रकार संगठन का हिस्सा….?

विनोद ही विनोद में राज की बात बता दें कि ना_सिर में जा रहे हैं वेद और सु वाले नील की नाराज़गी संगठन को भारी पड़ सकती है क्योंकि ये इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के वो थम्ब हैं जिनकी युवा पीढ़ी के पत्रकारों में खासी फैन फॉलोइंग है और गाहे बगाहे ही सही ये नवोदित पत्रकारों से टच में भी रहते हैं तो संगठन भी इनकी तरफ से गाफिल तो नहीं होगा वैसे मनाने की कोशिशें जारी हैं और हम भी ईश्वर से यही प्रार्थना करते हैं कि एक हैं एक रहें क्योंकि एकता में ही ताकत है क्योंकि इकलौता संगठन बचा है जो ग्वालियर से संचालित होता है और वैसे उन्हें हमसे मतलब तो नहीं है फिर भी राम राम दुआ सलाम हो जाती है तो दिल को भी सुकून मिलता है आखिर हैं तो अपने बड़े ही।
राम राम

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