ग्वालियर कलेक्ट्रेट में लाट साहबी Unlimited

ग्वालियर कलेक्ट्रेट में लाट साहब NO 2
देखिए इस वीडियो में लाट साहब की खास रिपोर्ट
लाट साहब शब्द आजादी से पहले का है जो देश की गुलामी का प्रतीक और अंग्रेज और हिन्दुस्तानियों के बीच की एक बड़ी लकीर का निर्माण करता था।
लेकिन देश की स्वतंत्रता के बाद और समय बीतने के साथ यह शब्द और व्यवहार कहीं दूर छूट गए हैं।
लेकिन कुछ काले अंग्रेज आज भी उसी ब्रिटिश राज की परंपरा को जिंदा रखे हुए हैं। इसका उदाहरण आज ग्वालियर कलेक्ट्रेट के जनसुनवाई के दौरान देखने को मिला।
कौन हैं ये लाट साहब देखिए…..?
ग्वालियर कलेक्ट्रेट में हर मंगलवार को होने वाली जनसुनवाई में अपनी गुहार लेकर पहुँचने वाले अपनी शिकायतें अपनी परेशानी लेकर आते हैं। लेकिन क्या यहाँ विराजमान लाट साहब नुमा अधिकारी इन्हें इंसान समझते हैं ये एक बड़ा सवाल है।
हालांकि कलेक्ट्रेट परिसर में बैठने वाले हर अधिकारी की तनख्वाह इन्हीं असहाय निर्धन और लाचार लोगों की खून पसीने की कमाई से दिए गए टैक्स से आती है। लेकिन जैसा कि ब्रिटिश राज में होता था कि अंग्रेज हम भारतीयों से निचले दर्जे का व्यवहार करते थे और ठीक वैसा ही नजारा ग्वालियर कलेक्ट्रेट में आज देखने को मिला। जब अपनी गुहार लगाने आई युवती अधिकारी के पैरों में बैठ गई। अपनी शिकायत लेकर आने वाले फरियादी बहुत मजबूर होते हैं। इतने ज्यादा कि इस उम्मीद मेंअफसरों के आगे झुककर सम्मान करते हैं कि वो अफसर उनके संकटमोचक हैं। उनकी समस्याओं को सुनेंगे उनका निराकरण करेंगे। लेकिन जब वही अफसर काले अंग्रेज की भूमिका अदा करने लगें तो वही पुराने अंग्रेजी राज की याद आ जाती है।
कलेक्ट्रेट में आई युवती काफी देर तक इस अफसर के कदमों में बैठी रही। हालांकि हॉल में काफी कुर्सियां मौजूद थीं लेकिन अफसर भी अपनी लाट साहबी के रुवाब में था और उसने भी उस युवती को कुर्सी पर बैठने के लिए नहीं कहा।
सवाल ये उठता है कि जो अफसर हमारे टैक्स के पैसों सो अपना और अपने परिवार का पेट भरने हैं क्या उनका ये लाट साहबी वाला रवैया उचित है…..?
ये अफसर जनता के नौकर हैं या सरकार के…..?
ये अफसर जनता के प्रति जवाबदेह हैं या सरकार के प्रति…..?
सबसे अहम बात यह है कि ये लाट साहब वो हैं जिनका विभाग ही महिलाओं के हितों की रक्षा करना है अर्थात महिला बाल विकास विभाग अब काले अंग्रेज और लाट साहबी का पर्याय बन चुका है।
वैसे भी जब सरकारें जनता से ज्यादा सत्ता सिंहासन की होड़ में लगी हों तो इस तरह के नजारे कोई बड़ी बात नहीं हैं।
