गुना में वन भूमि पर कब्जे को लेकर आदिवासी समुदायों के बीच खूनी संघर्ष
पुलिस वाले भी जान बचाकर भागे_18 घंटे बाद निकली बुजुर्ग का शव
एंकर -: मध्य प्रदेश के गुना जिले में भील और भिलाला आदिवासियों के बीच वर्चस्व की लड़ाई को लेकर जमकर पथराव गोफन और तीर चले आदिवासी समुदायों के बीच हुए इस संघर्ष में तीर लगने से एक बुजुर्ग की जान चली गई। विवाद लगभग 1000 बीघा वन भूमि को लेकर था जिस पर दोनों ही पक्ष अपना कब्जा जाता रहे। भील और बिल्ला समुदाय की पंचायत में इस जमीन पर कब्जे को लेकर सहमति न बन पाने के चलते हालात बिगड़े और 500 से ज्यादा लोग अपने हथियार लेकर आमने-सामने आ गए।
गुना जिले के बमोरी इलाके के चाकरी और छिकारी गांव में मंगलवार को फिर आदिवासी आमने सामने हो गए। फॉरेस्ट की जमीन पर कब्जे को लेकर चले गोफन, तीर में एक बुजुर्ग की जान चली गई। वहीं एक दर्जन घायल हैं। सैकड़ों की संख्या में पुलिस फोर्स गांव में तैनात है। लगभग 18 घंटे बाद शव को गांव से निकाला जा सका और बमोरी अस्पताल ले जाया गया।
इसके मूल कारणों में जाने का प्रयास किया जाए तो एक और बहुत महत्वपूर्ण बात है जो निकलकर सामने आती है। दरअसल, पिछले 15- 20 वर्षों में झाबुआ, अलीराजपुर के आदिवासी बमोरी इलाके में आकर बसे हैं। बमोरी के आदिवासियों की भी झाबुआ, अलीराजपुर में रिश्तेदारी और संबंध हुए हैं। वहां के आदिवासियों का यहां आकर बसने का कारण है उस इलाके में नर्मदा नदी पर बनी बड़ी बड़ी परियोजनाओं में इन आदिवादियों की जमीनों का अधिग्रहण हो जाना या फिर डूब में आ जाना। ऐसे में उन आदिवासियों के सामने रोजी रोटी का संकट खड़ा हो गया।
दरअसल आदिवासियों के बीच हुए इस विवाद को जंगल की जमीन के विवाद को केवल कब्जे के विवाद के रूप में देखा जा रहा है। जबकि, यह इससे कहीं आगे तक की बात है। पिछले लगभग 20 वर्षों की स्थिति पर गौर करें, तो बमोरी इलाके में सबसे ज्यादा जंगल कटे हैं और इन पर कब्जे हुए हैं। खुद सरकार कोर्ट में कह चुकी है कि गुना में 51 हजार हैक्टेयर जंगल काटे जा चुके हैं। जंगलों पर कब्जे को अधिकतर लोग केवल राजनैतिक व्यक्तियों की शह को कारण मानते हैं। ज्यादातर लोग यही कहते नजर आते हैं कि इस इलाके के जनप्रतिनिधियों ने जंगलों पर कब्जे करा दिए।
यही कारण है कि वहां से बड़ी संख्या में आदिवासियों का पलायन हुआ और वो गुना जिले के बमोरी इलाके और इसके आसपास आकर बसे। आदिवासी हमेशा जंगल पर ही आश्रित रहा है। ऐसे में वहां के आदिवासियों ने यहां आकर जंगल की सफाई शुरू की और जमीन को खेती लायक बनाया। यहीं से विवाद की मूल जड़ शुरू होती है। अब देखना यह है कि पुलिस प्रशासन आदिवासियों के बीच संघर्ष को कैसे रोक पाता है क्योंकि एक व्यक्ति की मौत के बाद पूरे इलाके में भारी तनाव के बीच आदिवासी समुदाय भी बेहद गुस्से में नजर आ रहा है।
वैसे देखा जाए तो गुना जिले का जो मूल आदिवासी है, वह सीधा और शांति प्रिय रहा है। लेकिन उस तरफ का आदिवासी थोड़ा तेज तर्रार और हथियार चलाने में माहिर रहा है। परन्तु, जब यहां के मूल आदिवासियों को भी थोड़ी दम आई, तो उन्होंने भी जंगलों पर कब्जे के प्रयास शुरू कर दिए। उन्हें कुछ राजनेताओं का भी प्रश्रय मिला। 2023 का विधानसभा चुनाव तो आदिवासियों द्वारा खेती लायक बनाई गई जमीन पर पट्टा दिलाने के नाम पर ही लड़ा गया। पूर्व मंत्री महेंद्र सिंह सिसोदिया जिस आदिवासी को अपना कोर वोटर मानते थे, वही उनके हाथ से खिसक गया, क्योंकि कुछ लोगों द्वारा आदिवासियों को यह कहकर दिग्भ्रमित किया गया कि कांग्रेस की सरकार बनेगी, तो उन्हें इस जमीन के पट्टे दे दिए जाएंगे। यहीं से आदिवासियों में एक मैसेज गया और उन्होंने कांग्रेस के पक्ष में वोटिंग कर दी और भाजपा प्रत्याशी को हार का मुंह देखना पड़ा।
