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कौन जीतेगा मैच से पहले का मैच…? Scindia/BJP/Hindu Organization/BCCI

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अटक से कटक तक हिंदवी स्वराज की पताका
बुलंद करने वाले सिंधिया पर हिन्दू संगठनों का‌ वार

राजा और रंक की कोई जाति नहीं होती और शास्त्रों में भी यही लिखा है कि राजा और रंक किसी एक जाति के नहीं होते वैसे तो साधुओं के लिए भी यही कहा गया है कि “जात न पूछो साधु की पूछ लीजिए ज्ञान” लेकिन आजकल साधु भी जाति विशेष के हो गए हैं और राजा भी जातियों से पहचाने जाने लगे हैं। लेकिन ग्वालियर का राजघराना आज भी जातिवाद में विश्वास नहीं रखता। यही वजह है कि सिंधिया राजवंश ने यदि मंदिर बनवाए हैं तो मस्जिद गुरुद्वारे और चर्च बनवाने में भी उतनी ही दिलचस्पी दिखाई है। और यही परम्परा निभाई है सिंधिया राजघराने के वर्तमान उत्तराधिकारी महानआर्यमन सिंधिया ने। हालांकि बीसीसीआई जैसा दुनिया की सबसे धनाढ्य निजी कंपनी का भी ठीक वैसी ही है। “न काहू से दोस्ती न काहू से बैर” वाली परिपाटी पर चलते हुए दुनिया भर में हो रही किसी भी कत्लेआम हिंसा और युद्धों को अपने एजेंडे से‌ खुद परे रखते हुए बीसीसीआई ने खुद को सर्व धर्म समभाव की तरह “सर्व राष्ट्र समभाव” के विचार में ढाल लिया है।

महानआर्यमन को प्रोजेक्ट करने की तैयारी पर लगा अपनों का ग्रहण

जिस प्रकार सिंधिया राजघराने को फर्क नहीं पड़ता कि कौन किस जाति का है किसका कत्लेआम हो रहा है कौन मारा जा रहा है कौन मार रहा है। अक्सर किसी भी विवादित विषय पर मुँह बंद रखने वाले सिंधिया परिवार का एजेंडा इस वक्त केवल एक ही है कि किसी भी तरह से राजघराने के उत्तराधिकारी और केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया के वारिस महानआर्यमन सिंधिया को देश‌ के राजनीतिक परिदृश्य का एक बड़ा सितारा बना दिया जाए। अपनी इस कोशिश में वे कुछ हद‌ तक सफल‌ भी होते नजर आ रहे हैं। जहाँ एक ओर ग्वालियर के ही पूर्व केंद्रीय मंत्री के पुत्र जो हॉकी इंडिया जैसे देश के सबसे प्रतिष्ठित संस्थान में बड़े और जिम्मेदार पद पर रहकर भी अपनी छाप नहीं छोड़ पाए वहीं ज्योतिरादित्य सिंधिया के पुत्र महानआर्यमन ने प्रदेश स्तर का एक छोटा टूर्नामेंट कराकर देश विदेश के खेल प्रेमियों की वाहवाही बटोर ली। हालांकि अब स्थिति इससे ठीक उलट है। हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान की बात करने वाली मोदी सरकार में राजाओं की जाति भी होती है और राजा को रिश्तेदारी भी निभानी पड़ती है। ठीक वैसा ही हुआ है इस राजा के साथ‌। मंच पर खुलेआम सिंधिया राजवंश की जाति का उल्लेख उन्हींकी पार्टी के एक मंत्री कर चुके हैं। अपनों के विरोध ने महानआर्यमन और महल के लिए मुश्किलें खड़ी कर दी हैं। लेकिन राजनीतिक खेल में माहिर खिलाड़ी सिंधिया परिवार के पास हमेशा से तुरूप का इक्का रहा‌ है जो उन्हें उनके विरोधियों पर भारी पड़ा है।

हिन्दू संगठनों के बढ़ते विरोध से सिंधिया राजघराने की छवि पर बट्टा लगने की आशंका

भारत बांग्लादेश का मैच घोषित होते ही अपने हुए पराए…
बांग्लादेश में तख्तापलट के बाद वहाँ हिन्दुओं पर हिंसा की खबरें आने के बाद देश भर में एक ओर आम हिन्दुओं में आक्रोश सड़कों पर आ रहा है। वहीं तमाम हिन्दू वादी नेता और संगठन भी बांग्लादेश के मुद्दे पर सरकार को घेरने में लगे हैं। लेकिन पूरे देश से इतर ग्वालियर में अलग ही माहौल नजर आ रहा है। यहाँ 6 अक्टूबर को प्रस्तावित भारत बांग्लादेश के मैच को लेकर हिन्दू संगठन और भाजपा के नेता सड़कों पर हैं। हिन्दू संगठनों के इस बवाल से सिंधिया परिवार की हिन्दू वादी छवि पर आघात लगना तय है। अखिल भारतीय हिन्दू महासभा ने खून से लिखकर प्रधानमंत्री से मैच रद्द करने की मांग की है। वहीं दूसरी ओर हिन्दू महासभाइयों नए नवेले स्टेडियम की पिच खोदने की धमकी भी दे रहे हैं। साथ ही भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व जिलाध्यक्ष राज चड्ढा भी इस मैच के विरोध में मुख्य हो गए हैं। अब देखना ये है कि ग्वालियर में होने वाले हर विकास और बड़े इवेंट का श्रेय लेने वाले सिंधिया परिवार अपने ही घर में हो रहे विरोध से कैसे शांत कर पाते हैं।

भारत बांग्लादेश पर मंडरा रहे संकट के बादल क्या प्रायोजित हैं…?

अखिल भारतीय हिन्दू महासभा, भाजपा के पूर्व जिलाध्यक्ष और खुद भाजपा सांगठनिक तौर पर बांग्लादेश का विरोध सड़कों पर ही कर रही है। पूरे शहर में जहाँ एक ओर भाजपा कार्यकर्ता आक्रोश रैली निकाल रहे हैं वहीं दूसरी तरफ हिन्दू महासभा अपने खून से प्रधानमंत्री के नाम ख़त लिखकर मैच रद्द करने की मांग कर रही है। कुछ हिन्दू संगठनों का कहना है कि हम बांग्लादेश की टीम को शहर में नहीं घुसने देंगे। फिर चाहे हमें स्टेडियम की पिच ही क्यों न खोद देनी पड़े। आपको बता दें कि ग्वालियर के शंकरपुर में बने नवीन स्टेडियम में होने वाले भारत और बांग्लादेश के बीच मैच को लेकर क्रिकेट प्रेमियों का मत अभी नहीं आया है वे इस ऊहापोह में हैं कि किसका साथ दें बांग्लादेश की टीम का विरोध करने वाले हिन्दू वादी संगठनों का या विकास करने का दावा करने वाले सिंधिया का। बहरहाल जो भी हो फिलहाल तो 14 साल बाद होने वाले इस अंतरराष्ट्रीय मैच का श्रेय लेने की होड़ मची है यदि सिंधिया इसका श्रेय ले जाते हैं तो महानआर्यमन के खाते में एक बड़ी उपलब्धि शामिल हो‌ जाएगी और यदि कहीं कोई रुकावट आती है तो ग्वालियर से एक और बड़ी सौगात छिन जाएगी जैसे कि इससे पहले ग्वालियर की जगह इंदौर को मैच दे दिया गया था। हालांकि राजनीति में कुछ भी संभव है अब संभव तो ये भी है कि कहीं मोहरे कहीं और से ही चले जा रहे हों और प्यादों को‌ आगे कर राजा‌ को मात देने‌ की तैयारी हो। क्योंकि जिस तरह से सिंधिया ने इतनी जल्दी भाजपा को आत्मसात किया है पार्टी में अपना‌एक मुकाम हासिल किया है और उनके धुरविरोधी बड़े नेताओं को घर बैठा दिया गया है इससे तो साजिश की बू भी नज़र आ रही है।

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