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प्रेस क्लब में क्यों मचा घमासान_कौन है सूत्रधार

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ग्वालियर प्रेस क्लब में तख्तापलट_पुराने अध्यक्ष ने मारा नहला पर दहला_ क्यों हुए पत्रकार लामबंद क्या हैं मांगें।

देखिए पूरा वीडियो…..

जब यूनाइटेड नेशंस में भारत को अस्थाई सदस्यता मिल सकती है तो क्या फील्ड में काम कर रहे नवोदित लेकिन योग्य पत्रकारों को जिन्हें जनसंपर्क की तरफ से किसी तरह की स्वीकार्यता हासिल नहीं है उन्हें प्रेस क्लब का अस्थाई सदस्य नहीं बनाया जा सकता….?

ये मांग है फील्ड में सालों से काम कर रहे ऐसे पत्रकारों की जो खबरों के लिए हर रोज यहाँ वहाँ भटकते नजर आते हैं यही नहीं इन कलमकारों की सेवाएं वरिष्ठ पत्रकार भी लेते हैं लेकिन इनकी आवाज कोई नहीं उठाता।

यह एक महत्वपूर्ण और पत्रकारों के हित से जुड़ा सवाल है हालांकि उदाहरण का स्तर वैश्विक है। लेकिन इस उदाहरण के कई मायने निकलते हैं। जो शायद पत्रकारिता की दुनिया में सालों से वरिष्ठता की प्रावीण्य सूची में कब्जा जमाए बैठे कथित मठाधीशों को रास नहीं आने वाले।

प्रेस क्लब के नेतृत्व ने ऐसा क्या किया कि सारे पत्रकार हो गए खिलाफ 

बड़े क्यों नहीं दिखाते बड़प्पन नवोदित और जमीनी पत्रकारों की  प्रेस क्लब में कैसे हो एन्ट्री

यहाँ (कथित मठाधीशों) शब्द के प्रयोग की धृष्टता के लिए वरिष्ठजनों से सादर क्षमा सहित एक बात कहना चाहूँगा कि पत्रकारिता जगत और प्रेस क्लब को जोर आजमाइश का अखाड़ा न बनने दें सालों से प्रेस क्लब की कमान संभालने वालों के लिए नए और पुराने कलमकारों को साथ में लेना उनका कर्तव्य है। लोकतंत्र के स्वयंभू चौथे स्तंभ की मर्यादा और प्रतिष्ठा को अक्ष्क्षुण रखने का जो दायित्व आपने वर्षों तक निभाया है यदि आपके मार्गदर्शन में पत्रकारों की नई पीढ़ी इस दायित्व का निर्वहन करना चाहे तो आपको उनका उत्साहवर्धन करने का बड़प्पन दिखाना होगा।

 

क्या है पूरा मामला ऐसे समझिए

ग्वालियर प्रेस क्लब अपने विवादों और कलमकारों के बीच बगावत को लेकर इन दिनों चर्चाओं में बना हुआ है। प्रेस क्लब को विगत वर्षों में काफी परेशानियों का सामना करना पड़ा था। लेकिन बावजूद इसके ग्वालियर प्रेस क्लब और ग्वालियर के इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के पत्रकारों के बीच अब तक सामंजस्य नहीं बैठ पाया है। यहाँ आपको एक बात बताना चाहेंगे कि ग्वालियर को छोड़कर मध्यप्रदेश के किसी भी प्रेस क्लब की सदस्यता में अधिमान्यता की शर्त नहीं है। लेकिन ग्वालियर प्रेस क्लब की स्थापना के समय से ही यहाँ सदस्यता लेने‌ वालों को अधिमान्यता लेने की अनिवार्यता में बाँध दिया गया है। इस नियम को लेकर शहर के अधिकांश इलेक्ट्रॉनिक प्रिंट और डिजिटल मीडिया के पत्रकारों में आक्रोश व्याप्त है। और इसे लेकर पिछले दिनों प्रेस क्लब के पुराने नियमों से नाराज पत्रकारों ने एक वरिष्ठ पत्रकार को प्रेस क्लब की कमान सौंप दी थी। हालांकि प्रेस क्लब की कमान सम्हालने में नाकाम रहे वरिष्ठ पत्रकार केवल शोपीस बनकर रह गए और पुराने और अनुभवी अध्यक्ष ने कागजी खानापूर्ति में मजबूत होकर नहले पर दहला मारते हुए महीनों बाद दमदार वापसी की। हालांकि पुराने अध्यक्ष ने शांत रहते हुए अपनी सत्ता बरकरार रखने में सफलता हासिल तो कर ली लेकिन उन्हीं के संगठन से टूटे हुए एक धड़े के इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया के कुछ वरिष्ठों ने उनके खिलाफ शहर भर के पत्रकारों को लामबंंद कर दिया जिससे माहौल तो भैया शानदार बन गया था और लगने लगा था कि अब पारी समाप्ति की घोषणा करके ही दम लेंगे किंतु हाथ आया मौका गंवाने के बाद पछताने के अलावा कुछ हासिल नहीं होता।

 

कब और कैसे होगा बायोलॉज में संशोधन…?

नवोदित और फील्ड के इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की प्रेस क्लब में हुई बैठक में तमाम सारे सवाल खड़े हुए हैं जिनमें से सबसे प्रमुख प्रश्न प्रेस क्लब के बायोलॉज में संशोधन करना है। क्योंकि इसके बाद ही गैरअधिमान्य कलमकारों को प्रेस क्लब में सदस्यता मिल सकेगी। बैठक में शामिल हुए इलेक्ट्रॉनिक प्रिंट और डिजिटल मीडिया के पत्रकारों का मानना है की समय के साथ ग्वालियर प्रेस क्लब के बायोलॉज में संशोधन होना चाहिए। प्रेस क्लब की स्थापना के समय से जारी बायोलॉज प्रिंट मीडिया पर केंद्रित है ऐसे में प्रमुख रूप से प्रिंट मीडिया के कलमकार ही इसमें काबिज रहे हैं।

पत्रकारों का यह मत बिल्कुल सही है कि प्रेस मीडिया की आधुनिकता के बदलते दौर में प्रिंट के अलावा मीडिया के कई माध्यम जैसे इलेक्ट्रॉनिक डिजिटल और सोशल मीडिया में भी लोग पत्रकारिता के कर्तव्य को बखूबी निभा रहे हैं देश के अधिकांश मीडिया चैनल और अखबार डिजिटल प्लेटफॉर्म पर आ चुके हैं और सोशल मीडिया के माध्यम से खुद को अपडेट कर रहे हैं ऐसे में प्रेस क्लब के बायोलॉजी में संशोधन आवश्यक है जो कि समय की मांग के अनुरूप ही है।

https://www.instagram.com/reel/DG6E0EloaW4/?igsh=dHJhNGxhZDA4ZjRk

प्रेस क्लब के बायोलॉज में संशोधन पर अध्यक्ष राजेश शर्मा को कोई आपत्ति नहीं

हालांकि इस मामले में प्रेस क्लब के अध्यक्ष राजेश शर्मा कहते हैं कि बायोलॉज मैं संशोधन करने में उन्हें कोई आपत्ति नहीं है साधारण सभा की बैठक में यह निर्णय हो सकता है अध्यक्ष के रूप में मेरा काम लोगों को जोड़ना है ना कि उन्हें तोड़ना। वे यह भी कहते हैं कि हमने पत्रकारों के लिए आर्थिक सहायता अधिमान्यता तमाम सारे ऐसे विषय उठाए हैं और हम लगातार पत्रकारों के हित में कार्य कर रहे हैं। प्रेस क्लब में सबका स्वागत है।

 

खैर जो होना है सो होना है क्योंकि वो दोहा तो आपको याद होगा कि…

होइहै सोई जो राम रचित राखा।

को करि तरक बढ़ावै साखा।।

https://www.facebook.com/share/v/1DC5n5mdrC/

कौन था सूत्रधार जिससे बागी पत्रकारों को मिला था सम्बल,

पुराने वाले निजाम की वापसी पर किस कटप्पा ने बदला पाला 

अंत में आभार इस पूरे एपीसोड के सूत्रधार का जो हम सबके वरिष्ठ हैं। एक ऐसे निर्विवाद निर्विरोध और निर्दोष व्यक्तित्व जो महाभारत काल के भीष्म पितामह और महिष्मति साम्राज्य के कटप्पा की तरह ही सिर्फ और सिर्फ सत्ता सिंहासन अर्थात प्रेस क्लब के अध्यक्ष की कुर्सी के प्रति निष्ठावान नजर आते हैं। बगावत के समय भी वे अध्यक्ष के ही साथ नजर आए। इसके बाद जब प्रेस क्लब का तख्तापलट विफल होने के उपरांत जब कई दिनों बाद पुराने अध्यक्ष की वापसी हुई तो उन्होंने उनका भी स्वागत करते हुए बाकायदा बागी खेमे से दूरी बना ली। हालांकि बागी अब भी ताल ठोक रहे हैं और सत्ताधारी केवल वेट एंड वॉच की स्थिति में नजर आ रहा है किन्तु जिस तरह से प्रेस क्लब के एक धड़े ने जिस तरह से बगावत की शुरुआत की थी और जमीनी कलमकारों का अपार समर्थन बागियों को मिलता नजर आ रहा है उससे तो यही लगता है कि बात निकली है तो दूर तलक जाएगी। बस हमारा डर केवल यही है कि बंदरों की लड़ाई में कहीं बिल्ली के भाग से छीका न टूट जाए। क्योंकि यदि ऐसा होता है तो तय मानिए कि जैसे पहले प्रेस क्लब के माथे पर नगर निगम जनसंपर्क कार्यालय और पर्यटन विभाग के नाम चस्पा हुआ था कहीं वैसा ही न हो जाए।

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