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बेटी के हत्यारे परिवार को मिला पुलिस का अभयदान…

दिल दहलाने वाली कहानी जहाँ परिवार ने अपनी ही बेटी को मार डाला… देखिए वीडियो

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सामान्य अपराधों में पुलिस की हीरोगिरी….
पुलिस का नाम आते ही हमारी आँखों के सामने एक ऐसे सुपर हीरो की छवि आ जाती है जो हमें हर मुसीबत अपराध और अपराधियों से बचाने में सबसे बड़ी मददगार है, और हो भी क्यों न जब अंधेरी सुनसान रात में कोई अकेला आदमी या औरत अकेले अपने गंतव्य की ओर जा रहा हो और उसे अचानक किसी अवांछित चीज या व्यक्ति से‌ डर लगे तो कहीं किसी चौराहे‌ पर‌ अकेला खड़ा सिपाही उसकी हिम्मत बढ़ा देता है भले ही आम जनता पुलिस को कितनी भी गालियां दे लेकिन जब कोई मुसीबत आती है अपराधी धमकाता है, या कोई मारपीट करता है तो केवल पुलिस ही काम आती है और पुलिस की यही देशभक्ति जनसेवा उसे सबसे खास बनाती है। इसके लिए कई मौकों पर सरकार खुद और आम जनता भी पुलिस का आभार व्यक्त करती है और सम्मान भी करती है।
कौन हैं पुलिस महकमे की काली भेड़ें…?
हालांकि पुलिस का जॉब Thank Less ही है और रहेगा क्योंकि जैसा कि अक्सर होता है जब एक मछली पूरे तालाब को गन्दा कर देती है ठीक वैसे ही पुलिस महकमे की कुछ काली भेड़ें पुलिस की छवि को बट्टा लगाने में जुटी हैं।

सत्तधारी और राजनीतिक रसूख के आगे बेबस पुलिस
हम बताते हैं आपको कि पुलिस विभाग में छुपी वो कौन सी काली भेड़ें हैं जो पुलिस की सद् रक्षणाय खल निग्रहणाय वाले व्यवहार को अपनी व्यवस्था बनाने में जुटी हैं। हालांकि गलती इनकी भी नहीं है क्योंकि काम की अधिकता और पैसे की किल्लत किसी को भी घुटनों पर ला‌ सकती है। इसके‌ अलावा भी कई चीजें हैं जो एक ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ पुलिस अधिकारी को भी नाकारा और स्वार्थी बना देती हैं कि उसे केवल अपनी नौकरी बजाने और बचाने से मतलब होता है जन सेवा कहीं दूर छूट जाती है क्योंकि इनकी देशभक्ति तो केवल 15 अगस्त 26 जनवरी की परेड और पुलिस विभाग की किताबों तक ही सीमित है। हम ऐसी ही चंद कहानियां आपके सामने लेकर आए हैं जो पुलिस विभाग का सच आपके सामने ले आएँगी। यहाँ हम आपको बताएँगे कि कैसे मध्यप्रदेश की जुझारू पुलिस गरीबों की भयंकर रूप से जनसेवा करती है कैसे बड़े बड़े घोटालों की पूरी जांच करने के बाद पर्दाफाश करने की बजाय उन्हें दबाकर बैठ जाती है क्योंकि ये जनता की नहीं सत्ता की सेवक है और कैसे किसी मासूम की मौत पर शिकायत न मिलने का बहाना बनाकर हत्या जैसे संगीन अपराध को सात तालों बंद कर देती है क्योंकि अपराधियों के राजनीतिक आकाओं का जलवा इस कदर है कि एक सिग्नल‌ पर किसी वाहन चालक की गलती पर जुर्माना वसूलने वाली पुलिस सत्ताधारी नेताओं के आगे नतमस्तक नजर आती है।

सत्यकथा- 01
एक थी स्मिता जिसे अपनों ने ही उतार दिया मौत के घाट
शिकायत के बाद भी हत्या पर पुलिस ने नहीं की जांच

कहते हैं कोई भी बच्ची सबसे ज्यादा अपने पिता माँ और घर के लोगों पर विश्वास होता है और वो यहाँ खुद को सुरक्षित महसूस करती है। लेकिन जब अपने ही जान के दुश्मन बन जाएँ तो मासूम बेटियाँ कहाँ जाएँगी। यहाँ सरकारों के बेटी बचाओ के दावे की पोल भी खुलती नजर आती है क्योंकि सरकार के तमाम एन्फोर्समेंट डिपार्टमेंट जिसमें पुलिस का काम और नाम सबसे पहले आता है उस पुलिस महकमे ने भी इस मासूम की हत्या के बाद मामले को पूरी तरह दबा दिया और मासूम की निर्मम हत्या की यह कहानी पुलिस की फाइल का हिस्सा भी नहीं बनी क्योंकि परिजनों ने शिकायत नहीं की और पुलिस हत्या के मामलों में परिजनों की शिकायत पर ही कार्रवाई करती है। स्मृता को उसके पिता ने ही मौत के घाट उतारा था तो शिकायत कौन करता।

स्मृता को पीट पीट कर अपनों ने ही उतार दिया मौत के घाट

मामला ग्वालियर के मुरारी गांव में रहने वाली मासूम छात्रा स्मिता गुर्जर का है जिसे अज्ञात कारणों से अपने पिता चाचा भाई और माँ की कहर का शिकार होना पड़ा। मुरारी स्थित बड़ौरी शासकीय हाईस्कूल की 9 वीं कक्षा में पढ़ने वाली छात्रा को उसके घर के अंदर पिता चाचा भाई द्वारा पीट पीट कर मार डाला। जिसकी कहीं कोई खबर नहीं कोई जानकारी नहीं लेकिन गाँव के ही एक युवक ने इस हत्याकांड की शिकायत जब पुलिस में की तो स्मृता के पिता और भाइयों ने उस युवक पर जानलेवा हमला किया। लेकिन बावजूद इसके पुलिस ने न तो कोई संज्ञान लिया और न ही इस हत्याकांड की जांच ही की। हालांकि उस समय जब हमने इस मामले को तत्कालीन एसपी नवनीत भसीन के सामने उठाया तो उन्होंने इस मामले में यही कहा कि परिजनों की शिकायत नहीं आई है। अब जिसे उसके पिता ने ही मारा हो उसकी शिकायत कौन परिजन करेगा। प्रत्यक्षदर्शी युवक सिकंदर गुर्जर के मुताबिक स्मृता को तार से फांसी लगाकर मारा गया था जिसके बाद आनन फानन में आई 20 कार में स्मृता की बॉडी को श्मशान में ले जाकर जला दिया गया इस मामले में गांव में भी कोई कुछ बोलने को तैयार नहीं क्योंकि हत्यारे परिवार के राजनीतिक और पैसे के रसूख के आगे पुलिस प्रशासन भी एक मासूम की हत्या पर मौन रहा। जब जांच नहीं हुई तो इसके गवाह और सबूत भी नहीं जुटाए गए हालांकि इस मामले में पड़ताल करते हुए हम पहुंचे एक RMP डॉक्टर स्वयं प्रकाश गौड़ के पास जहांँ उसने खुलासा किया कि स्मृता के पिता अपनी बेटी की हत्या करने के बाद डॉक्टर के पास उसकी बीमारी का फर्जी पर्चा बनवाने पहुँचे थे जिसे डॉक्टर ने मना कर दिया तो उन्होंने पुलिस को ही खरीद लिया। पुलिस चाहती तो पिता द्वारा अपनी बेटी को मारने की घटना का खुलासा कर सकती थी तो समझिए कि पुलिस डिपार्टमेंट में लोगों के गुनाह को छिपाकर अपनी जेबें भरने वाली ऐसी कितनी काली भेड़ें हैं।
देखिए पूरी रिपोर्ट इस लिंक में।

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