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थानों की सीढ़ियों पर न्याय के लिए भटकते परिवार_कब खत्म होगा ये इंतजार

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मुख्यमंत्री जी आ रहे हैं इसलिए पुलिस की सभी लाइनें व्यस्त हैं

कृपया समारोह के बाद भी संपर्क न करें क्योंकि यहाँ न्याय नहीं सीढ़ियों पर इंतजार मिलेगा

आज एक तस्वीर नजरों के सामने आई जो दिल को अंदर तक चीर गई। एक परिवार पुलिस थाने की सीढ़ियों पर पता नहीं किसका लेकिन मेरे हिसाब से शायद न्याय का इंतजार कर रहा है। साथ में वो मासूम बच्चा भी है जो नहीं जानता कि जिस थाने की बिल्डिंग की सीढ़ियों पर उसके गरीब माँ बाप बैठे हैं वह थाना इन्हीं लोगों के पैसे से निर्मित हुआ है। ये मासूम नहीं जानता कि उसके मम्मी पापा को न्याय के देने के लिए पुलिस सरकार और पूरा सिस्टम एयरकंडीशन केबिन में उसके माँ बाप के पैसों से मलाई खाकर बेहद मेहनत मशक्कत कर दिन रात एक कर रहा है। यहाँ पर आते जाते लोग (पुलिसिए) इस परिवार एक नजर देखकर अनदेखा कर देते हैं जैसे वह कोई बेकार का कचरा हो जो अब किसी काम का नहीं उसे कूड़ेदान में ही फेंका जाना चाहिए। इस थाने की सीढ़ियों पर बैठा यह परिवार अपने (जनता के) नौकरों को लाट साहब मानता है। उसकी हिम्मत भी नहीं और इजाजत भी कि वो‌ अपने पैसों पर पर रहे इन लाट साहबों से एक सवाल भी कर सके

अब थाना प्रभारी के इंतजार में सदियों ही क्यों न बीत जाएँ लेकिन न्याय तो आज पाकर ही रहेगा। लेकिन इस भोले भाले परिवार को क्या मालूम कि सिस्टम की कैद में छटपटाता हुआ न्याय केवल सत्ताधीशों नौकरशाहों और धनाढ्यों का‌ गुलाम है। जो उनकी कैद से निकलने को बेकरार है। लेकिन बस एक चोट चाहिए सिस्टम‌ पर नहीं बल्कि उन चुने हुए लोगों पर जिन्होंने न्याय को अपनी तिजोरी जेब या गाड़ी की पिछली डिग्गी में बाँधकर रखा हुआ है।

थानेदार साहब आएंगे तब बात हो पाएगी लेकिन न्याय और राहत की गारंटी‌‌ नहीं है क्योंकि शाम हो रही है। कल सीएम भी‌ आने वाले हैं तो भैया थाने‌ की‌ सीढ़ियों‌‌ पर‌‌ बैठे की संविधान न्याय कानून की नजरों में कोई‌ अहमियत नहीं है। लेकिन इतना जरूर है कि यदि किसी सिस्टम वाले पुलिसकर्मी व्यवसायिक निगाह इस पर पड़ गई तो ये परिवार काफी समय से अपने पैंट की अंदर की जेब में आड़े वक्त के रखे चंद रुपए उस न्याय की भेंट चढ़ा देगा जो इसे कभी मिलेगा नहीं।

खैर हमें क्या करना वाली जमाने की मानसिकता थोड़ी सी मेरी भी  है इसलिए मैं उन्हें देखकर चला आया और अब इसलिए लिख रहा हूँ कि कोई तो हो बोलने वाला लिखने वाला जिसके माध्यम से ही‌ सही कम से कम इस परिवार की गुहार सीएम के बंदोबस्त में जुटे न्याय दिलाने का‌ दावा करने वाले जिम्मेदारों तक तो पहुँचे।

क़लमकार संजय

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