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पुलिस है या जनता के मौलिक अधिकारों को कुचलने वाला गिरोह

अत्याधुनिक वेपन से लैस गिरोह (पुलिस) की असीमित शक्तियाँ क्या लोकतंत्र को कुचल रहीं हैं

जनता द्वारा चुने गए सत्ताधीशों का हथियार बन कर रह गई है पुलिस

मध्यप्रदेश के थानों के दरवाजों पर आम आदमी की इन लम्बी लम्बी कतारों को आप कैसे देखते हैं। क्या आपको नहीं लगता कि थानों और पुलिस को असीमित अधिकार देकर संविधान और कानून ने आपके साथ छल किया है। क्या आपको लगता है इस भीड़ में खड़े एक भी व्यक्ति को पुलिस सुविधा शुल्क वसूले बिना समय से न्याय दे पाई है या दे पाएगी। ये नजारा शहर के एक थाने का है जहाँ जिस समय थाना प्रभारी को मौजूद होना था वो वीआईपी ड्यूटी में व्यस्त थे इसलिए इस भीड़ भी गुहार सुनने वाला कोई नहीं था। हाँ थे एक दो हैड कांस्टेबल एक एएसआई और चंद सिपाही चूँकि थाना कभी खाली नहीं छोड़ा जाता तो इन दो चार पुलिसकर्मियों का मौजूद होना फरियादी को दिखावे के लिए ही सही लेकिन एक बड़ी आस तो बँधा ही देता है फिर चाहे वो आशा उनकी घुड़कियाँ सुनकर निराशा में क्यों न बदल जाए। कुछ लोगों से चर्चा और विमर्श के बाद मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि

दरअसल पुलिस नाम की ये व्यवस्था ब्रिटिश राज काज को निर्बाध रूप से संचालित करने के लिए अंग्रेजों ने बनाई थी जिसे हम और हमारा So Called लोकतंत्र आजादी के 77 साल बाद भी ढोने को मजबूर है।

चूँकि हमारे कथित रहनुमा भी उन्हीं अंग्रेजों के नक्शे कदम पर चलते हुए अपनी सत्ता सिंहासन को सुरक्षित रखे हुए हैं। अंतर इतना है अंग्रेज शासक और उनके नुमाइंदे जनता को सीधे भीगा हुआ जूता मारते थे और वद्तमान वाले काले अंग्रेज हमें मखमल में लपेटकर जूता मारते हैं। चलिए वो भी ठीक है शासन प्रशासन चलाने के लिए जूते मारने पड़ते हैं और मारना भी चाहिए क्योंकि आम जनता को डरा कर रखना (सुलाना) बहुत जरूरी है ठीक वैसे ही जैसे किसी बच्चे को उसके माँ बाप (अपना काम निकालने के लिए) डराकर सुलाते हैं और नहीं सोता तो मारपीट भी कर देते हैं। और बहाना ये कि ये पिटाई बच्चे की बेहतरी के लिए है अब इसे अबोध बच्चा नहीं समझता ठीक वैसे ही इस देश में आम जनता को भ्रम में रखा गया है। जनता समझती है कि पुलिस प्रशासन हमारी भलाई के लिए सख्ती करते हैं लेकिन वो ये नहीं जानती कि

पुलिस प्रशासन आपके दिए टैक्स के पैसों से अपनी असीमित शक्तियों और अपरिमित संसाधनों को चंद सत्ताधीशों और देश के नामचीन धनाढ्यों के इशारों पर आपके ऊपर मनमाने हुक्म मनवाने वाला एक अत्याधुनिक वैपन से लैस गिरोह है

जो उनके इशारों पर आपके मौलिक अधिकारों के साथ आपकी जिंदगी को तहस नहस कर देती है। यही नहीं यदि ये सत्ताधीश यदि आदेश दें तो संविधान और कानून व्यवस्था के नाम पर आपको आपके परिवार को इतनी यातनाएँ दे सकती है कि आपकी जिंदगी जहन्नुम बन सकती है। मेरा सवाल है कि क्या ब्रिटिश शासनकाल की याद दिलाने वाले इस सुसंगठित गिरोह के खिलाफ कोई ऐसा कानून नहीं लाया जाना चाहिए जिससे कम से कम फरियाद करने वाले व्यक्ति को त्वरित न्याय मिलना सुनिश्चित हो सके। कहते भी हैं कि देरी से मिला हुआ न्याय अन्याय के समान होता है असीमित अधिकारों के साथ आम जनता को कुचलने का हक इन्हें किसने दिया है क्या हमने….?

और यदि हमने ही इन्हें हमें कुचलने का अधिकार दिया है तो कुछ ऐसा नहीं हो सकता कि जब कोई पुलिसकर्मी या अधिकारी या फिर कोई जनप्रतिनिधि जनता के हकों को छीनने का प्रयास करे तो उसे उस की जुबान में जवाब देने की व्यवस्था हो।

 

 

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