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ग्वालियर के भाग्य विधाता या फिर दुर्भाग्य का प्रतीक

ये ग्वालियर के भाग्य विधाता हैं….?

हालांकि ग्वालियर जैसे पॉलिटिकल पॉवर सेंटर शहर में हर अधिकारी अपनी पूँछ बचाकर ही काम करता है क्योंकि यहाँ कथित महाराज बॉस दादा और भाईसाहबों की ज्यादा चलती है बजाए शासन प्रशासन के। ये यहाँ आकर केवल अपनी नौकरी करते हैं और दो तीन साल में चलते बनते हैं। फिर भी ग्वालियर की जनता इन्हें बड़ी ही उम्मीद से देखती है क्योंकि यहाँ के जनप्रतिधिनयों से तो किसी भी चीज की आशा करना बेमानी है। लेकिन जिस तरह आम जनता की सारी उम्मीद धराशाई हो जाएँ जहाँ लगातार बढ़ते अपराध और अपराधी बेलगाम होते माफिया, निरंकुश नौकरशाह जो केवल रसूखदार और भू माफियाओं के हाथों की कठपुतली बन चुके हों, इसके साथ ही शहरी नागरिकों की मूलभूत आवश्यकताओं को पूरा करने वाले नगर निगम अधिकारी भी कहीं न कहीं शहर के प्रति लापरवाह नजर आते हैं।

बहरहाल पुलिस की उदासीनता और रसूखदारों के साथ मिली भगत के चलते शहर की सड़कों पर अपराध बेलगाम हैं….?

जिला प्रशासन के भ्रष्ट अफसर भू माफियाओं को शासकीय जमीनों के साथ अपना जमीर भी नेताओं की चौखट पर गिरवी रख चुके हैं……..?

नागरिकों के मौलिक अधिकारों और मूलभूत सुविधाओं का हनन करने वाले नगर निगम भी अपनी हद पार कर चुका है क्योंकि शहर की धूल भरी सड़कों पर खाँसते लोग, गंदा पानी पीकर बीमार होती आम जनता। सरकार द्वारा प्रायोजित गड्ढों में मरते लोग नगर निगम के खाते में ऐसी हजारों उपलब्धियाँ हैं जो शहर के नागरिकों को सरकार का तोहफा है।

नोट-: मैंने इस पोस्ट में स्थानीय नेताओं का नाम नहीं लिया क्योंकि शहर में हो रही दुर्घटनाओं में उनका अपना नहीं मरता, न ही वे ऐसे रास्तों से निकलते हैं जहा॔ गड्ढे धूल और कीचड़ हो, ये नेता केवल अपनी सत्ता और स्वार्थ के लिए जीते हैं और इनकी बलि चढ़ती है केवल और केवल आम जनता। इसलिए ये हमारे लिए हमारे देश के लिए एक बोझ के अलावा कुछ नहीं हैं।

#क़लमकार_संजय

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