आजादी के जश्न में न्याय माँगना पड़ा भारी_
बिजली कंपनी के अधिकारियों के शिकार हुए घायल पिता के लिए न्याय माँग रहे युवक के साथ पुलिस की दबंगई
मध्यप्रदेश में आउटसोर्स बिजली कर्मियों की जान सबसे सस्ती है ये हम नहीं कह रहे यह बात इस परेशान युवक के दर्दनाक दास्तान सुनकर समझ आई कि जहाँ एक ओर पूरा देश आजादी की 80 वीं वर्षगाँठ मना रहा है वहीं यह युवक आजादी के अवसर पर एसएएफ ग्याउंड के बाहर अपने मरणासन्न पिता का लिए न्याय की गुहार लगा रहा है। और इसके पिता के गुनहगारों को उसका बाहर बैठना भी सहन नहीं हो रहा।
ग्वालियर में बिजली विभाग में आउटसोर्स कर्मचारी के तौर पर काम करने वाले हरिओम शर्मा के साथ बिजली कंपनी के अधिकारियों की लापरवाही से बड़ी विद्युत दुर्घटना हो गई थी। जिसका बाद गंभीर रूप से घायल हो गए थे। हरिओम शर्मा के पुत्र हिमांशु शर्मा के मुताबिक न तो उन्हें बिजली कंपनी से कोई मदद मिली और न ही पुलिस ने उनकी रिपोर्ट ही दर्ज की। जबकि हिमांशु लगातार थाने से लेकर एसपी ऑफिस के कई बार चक्कर लगाकर थक चुके है। जब उनकी सुनवाई नहीं हुई तो वे आज स्वतंत्रता दिवस के मौके पर आयोजित मुख्य समारोह में पहुँचे और आयोजन स्थल के बाहर धरने पर बैठ गए। गौतलब है कि आज ग्वालियर में ध्वजारोहण विधानसभा अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर ने किया था तो हिमांशु ने पुलिस से कहा कि वे नरेंद्र सिंह तोमर से न्याय माँगने आए हैं लेकिन पुलिस ने उन्हें थाने जाचर एफआईआर करने के बहाने आयोजन स्थल से बाहर का रास्ता दिखा दिया। तस्वीरों में आप देखेंगे कि सीएसपी नागेंद्र और कई थानों के थाना प्रभारियों ने हिमांशु की बलपूर्वक उठा कर बाहर कर दिया। हिमांशु ने बिजली कंपनी के कुछ अधिकारियों पर गंभीर लापरवाही के आरोप लगाते हुए उन सभी अधिकारियों पर एफआईआर की माँग की है। हालांकि हजीरा थाना प्रभारी जितेन्द्र तोमर बार बार यह कहते देखे गए कि तुम मेरे पास नहीं आए। लेकिन बड़ा सवाल यह उठता है कि जब ऊर्जा मंत्री प्रद्युम्न सिंह तोमर दुर्घटना के बाद खुद हरिओम शर्मा को देखने उनके घर पहुँचे थे तो ऐसा क्या हुआ कि चार महीनों बाद आज भी आउटसोर्सकर्मी हरिओम शर्मा और उनके पुत्र को न्याय नहीं मिला है। इससे साबित होता है कि नेताओं के वादों और दावों पर भरोसा नहीं किया जा सकता। जहाँ एक ओर आयोजन स्थल के अंदर सभी लोग आजादी का जश्न मना रही थी वहीं दूसरी तरफ एक युवक को अपने पिता के लिए न्याय की गुहार लगाने से भी रोका जा रहा था क्या यही है आजादी…?
