ग्वालियर,बेजुबान बंदर को तड़प तड़प कर मरने छोड़ा,
वन विभाग नगर निगम से लेकर कलेक्टर ने भी घायल बंदर को बचाने से किया इनकार।
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ग्वालियर नगर निगम के अंतर्गत आने वाले गाँधी प्राणी उद्यान की जिम्मेदारी जानवरों को बचाना नहीं है चाहे वो बंदर हैं या कोई अन्य प्रजाति, नगर निगम के पास न तो घायल जानवरों को बचाने के लिए पर्याप्त डॉक्टर हैं और न ही जानवरों को रेस्क्यू करने वाला अमला। आपको जानकर हैरानी होगी ठीक यही स्थिति वन विभाग की भी है वन विभाग में जानवरों के संरक्षण के लिए करोड़ों रुपए का फंड कहां खर्च होता है कोई नहीं जानता क्योंकि कहावत है कि जंगल में नाचा मोर किसने देखा। ये खुलासा तब हुआ जब ग्वालियर के बिरला नगर इलाके में पिछले दो दिन पहले करेंट से झुलसा हुआ बंदर जिसे हम हनुमान की संज्ञा देते हैं वस बेहद दयनीय स्थिति में तड़पता हुआ मिला। एक लोकल चैनल के रिपोर्टर ने जिम्मेदारी निभाते हुए नगर निगम वन विभाग से लेकर प्रशासन तक के जिम्मेदार अधिकारियों और कर्मचारियों को फोन कर दिए कि भाई इस बंदर की हालत बहुत नाज़ुक है इसलिए इसका समुचित इलाज किया जाए और यहाँ से ले जाकर किसी शेल्टर में रखा जाए। लेकिन वे सरकारी अधिकारी ठहरे कलेक्टर कमिश्नर का फोन उठा नहीं हद तो तब हो गई जब वन्य प्राणी संरक्षण अधिनियम का पालन करने और कराने वाले वन विभाग का डीएफओ मुकेश पटेल ने भी फोन उठाना मुनासिब नहीं समझा। वैसे वन विभाग के लिए जानवरों का मरना एक सामान्य प्रक्रिया होती है तो ये इंसानों के विकासवाद की बलि चढ़ने वाला ये बंदर का क्या चीज़ है। बहरहाल तमाम फोन करने और लोगों से संपर्क करने के बाद वन्य प्राणियों के हित में कार्य कर रहा एक एनजीओ सामने आया और उसने बंदर का इलाज करने की जिम्मेदारी ली लेकिन उनके पास भी यही समस्या थी कि इस घायल जानवर को रखा कहांँ जाए। बहरहाल जानवरों के नाम पर अपना पेट भरने वाले जिम्मेदार विभागों ने तो इस बंदर को मारने में कोई कसर नहीं छोड़ी लेकिन भला हो जिस जीवाश्रम नामक एनजीओ का जिन्होंने इंसानियत का परिचय देते हुए करेंट खाकर तड़पते हुए बंदर के इलाज की व्यवस्था की। यदि आप इस खबर को देख रहे हैं तो नगर निगम आयुक्त वन विभाग के डीएफओ और शहर की जिम्मेदारी सम्हालने वाली कलेक्टर साहिबा तक जरूर भेजें ताकि उन्हें अपने दायित्वों का एहसास हो और आगे ऐसी घटना न हो।
