बुजुर्ग की एक कविता ने बजा दी पूरे देश के सिस्टम की बैंड
एक गाँव की चौपाल पर बेवजह बैठे बुजुर्ग का दर्द समझा जा सकता है जो उसने एक कविता के माध्यम से बयां किया है। ये केवल कविता नहीं एक हकीकत है देश की समाज की समाज को अपने पंजे में जकड़े हुए काले अंग्रेजों की। जिन्होंने केवल चंद चाँदी के टुकड़ों और अपने स्वार्थ की खातिर देश की अस्मिता और इंसानियत को शर्मसार किया है। ये कविता नहीं ये हमारे चुने गए रहनुमाओं के मुँह पर उनका मानमर्दन करने वाले बुजुर्ग ने देश के पूरे सिस्टम को कटघरे में खड़ा किया है। ऐसे बुजुर्ग आपको हर गांव की चौपाल शहरों के गली मोहल्ले और आपके अपने आंगन में घूमते मिल जाएँगे जो सिस्टम से हार चुके हैं लेकिन उनकी जुबानें बंद हैं किंतु बेखौफ बेहिचक बेधड़क होकर इस बुजुर्ग ने जो देश के सिस्टम का तानाबाना अपनी कविता के जरिए साझा किया है वो आज की सच्चाई है इसे सुनेंगे तो आपको लगेगा कि जो आप बहुत पहलै से कहना चाहते थे वो इस बुजुर्ग ने कहा दिया है आपको बस इसका समर्थन करना है यदि आप सत्ता सिंहासन और सिस्टम के सामने गूंगे हैं तो…..!
